केवल वैश्विक बाज़ार ही नहीं, भारत की साख भी दांव पर: डब्ल्यूएचओ-एफसीटीसी की विश्वसनीयता खतरे में

लेखक – डॉ. धीरेश कुलश्रेष्ठ, प्रोफेसर एवं डीन, अर्थशास्त्र संकाय, चितकारा यूनिवर्सिटी, पंजाब
प्रतापगढ़ से लेकर गुंटूर तक, भारत के तंबाकू किसान बदलाव के विरोध में नहीं, बल्कि उसके लिए तैयार हैं। आज जब वैश्विक बाज़ार तेज़ी से ट्रैसेबिलिटी (उत्पत्ति और गुणवत्ता की पहचान), ईएसजी अनुपालन और अगली पीढ़ी के तंबाकू उत्पादों की ओर बढ़ रहा है, तब भारत के पास एक ऐसा मौका है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। यह मौका है – अपने तंबाकू क्षेत्र का आधुनिकीकरण करने का, ग्रामीण आजीविकाओं को सशक्त बनाने का, और डब्ल्यूएचओ के फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल (एफसीटीसी) के तहत अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य और व्यापारिक विश्वास को और मज़बूत करने का।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तंबाकू उत्पादक देश है, जहां आंध्र प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश और अन्य कई राज्यों में लाखों लोग इसी पर निर्भर हैं। यह क्षेत्र भले ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो, लेकिन आर्थिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है — और इसलिए इसे नीति-निर्माण से अलग नहीं रखा जा सकता। एक आधुनिक और पारदर्शी दृष्टिकोण अपनाकर भारत निर्यात बढ़ाने और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा के बीच संतुलन बना सकता है।
यह लेख तंबाकू के समर्थन में नहीं है, बल्कि नीति की उपेक्षा के खिलाफ एक स्पष्ट चेतावनी है। तंबाकू क्षेत्र पहले से ही बड़े पैमाने पर मौजूद है। सवाल यह नहीं है कि उसे मान्यता दी जाए या नहीं, बल्कि यह है कि उसे किस तरह सही ढंग से प्रबंधित किया जाए।
भारत में तंबाकू आधारित अर्थव्यवस्था बेहद विविधतापूर्ण है। प्रतापगढ़ जैसे इलाकों में हजारों किसान बीड़ी तंबाकू की खेती करते हैं, लेकिन यह पूरा तंत्र अभी भी अनौपचारिक है और नकद लेनदेन पर आधारित है। इन आपूर्ति शृंखलाओं में न तो गुणवत्ता की कोई गारंटी है, न ही ट्रैसेबिलिटी और न ही बाज़ार तक सीधी पहुंच। गुजरात के आनंद और वडोदरा जैसे क्षेत्रों में प्रोसेसर अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार रीकॉन्स्टिट्यूटेड और स्मोकलेस तंबाकू उत्पाद तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें प्रमाणन और अनुपालन की राह में अकेले ही संघर्ष करना पड़ रहा है। आंध्र प्रदेश में एफसीवी (फ्ल्यू-क्योर्ड वर्जीनिया) तंबाकू के किसान एक और गहरे संकट का सामना कर रहे हैं—इस साल उत्पादन निर्धारित सीमा से करीब 80 मिलियन किलो अधिक हो गया, जिससे कीमतों में गिरावट आई और किसानों को विरोध प्रदर्शन करने पड़े। दो साल पहले जब ब्राज़ील में आपूर्ति बाधित हुई थी, तब भारत को थोड़ा लाभ मिला था, लेकिन अब वह राहत भी खत्म हो गई है।
जहां एक ओर भारतीय किसान और प्रोसेसर बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, वहीं नीति समर्थन अभी भी पीछे छूटा हुआ है। वर्ष 2023–24 में भारत ने 12,000 करोड़ रुपये से अधिक के तंबाकू उत्पादों का निर्यात किया, लेकिन इसमें 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कच्चे या आंशिक रूप से प्रोसेस किए गए पत्तों का था, जिनकी कीमत महज़ 256 रूपए से 342 रूपए प्रति किलोग्राम रही। वहीं, स्विट्ज़रलैंड और इटली जैसे देश इन्हीं पत्तों का आयात कर उनसे उच्च मूल्य वाले बिना जलाए जाने वाले (नॉन-कंबशन) उत्पाद बनाते हैं और उन्हें पांच से दस गुना अधिक कीमत पर फिर से निर्यात करते हैं।
अप्रैल 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने आईटीसी के निकोटीन एयरोसोल डिवाइस के पेटेंट को खारिज करने के पेटेंट ऑफिस के फैसले को रद्द कर दिया और स्पष्ट किया कि अस्वीकृति का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था। इस फैसले से भारत में हीटेड टोबैको प्रोडक्ट्स (गैर-दहनशील तंबाकू उत्पादों) में नवाचार का रास्ता साफ हुआ — यह वह श्रेणी है जो जापान, इटली, ब्रिटेन और दक्षिण कोरिया सहित 80 से अधिक देशों में पहले ही वैध और नियमित है। ये नॉन-कंबशन उत्पाद वैश्विक तंबाकू व्यापार का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ क्षेत्र हैं। आईटीसी की यह पहल बताती है कि भारतीय कंपनियां इस बदलाव को न केवल समझ रही हैं, बल्कि प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार भी हैं। लेकिन अफसोस, हमारी नीतियां अभी भी इस बदलाव की गति से मेल नहीं खा पा रही हैं।
निष्क्रियता के दुष्परिणाम सिर्फ निर्यात में गिरावट तक सीमित नहीं रहते। जब वैश्विक मांग कम होती है, तो अधिशेष तंबाकू घरेलू बाज़ार में भर जाता है। इससे कीमतें गिर जाती हैं, अनौपचारिक बिक्री बढ़ती है और तंबाकू की उपलब्धता आसान हो जाती है — खासतौर पर युवाओं के लिए। यह स्थिति तंबाकू नियंत्रण पर डब्ल्यूएचओ के एफसीटीसी के तहत भारत की उन प्रतिबद्धताओं को भी कमजोर करती है, जिनमें आपूर्ति नियंत्रण, अवैध व्यापार की रोकथाम और खपत पर अंकुश शामिल हैं।
एक संगठित और औपचारिक प्रणाली से कई फायदे मिल सकते हैं — किसानों को स्थिर कीमतें, नियमन को मजबूती और सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्यों के साथ बेहतर तालमेल। एक राष्ट्रीय स्तर की समन्वित पहल की शुरुआत एफसीवी तंबाकू के लिए ट्रेसबिलिटी प्लेटफॉर्म से की जा सकती है, जिसे धीरे-धीरे बिना धुएं वाले और बीड़ी जैसे अन्य खंडों तक बढ़ाया जा सकता है। पाउच या पुनर्गठित उत्पाद जैसे वैल्यू-ऐडेड नॉन-कम्बशन उत्पादों को रणनीतिक निर्यात उत्पाद का दर्जा दिया जाना चाहिए। प्रमाणित कृषि क्लस्टरों को सीधे निर्यात-योग्य इकाइयों से जोड़ा जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात, अनौपचारिक क्षेत्रों के किसानों को प्रशिक्षण और अनुपालन प्रणालियों तक पहुंच मिलनी चाहिए।
अन्य तंबाकू उत्पादक देशों ने दिखाया है कि सुधार किस तरह किया जा सकता है। ब्राज़ील ने 2023 में सहकारी खेती और गुणवत्ता-आधारित अनुबंधों के माध्यम से 2.5 अरब डॉलर की कमाई की। इंडोनेशिया ने स्पष्ट नियमन और वैश्विक निवेश आकर्षित कर खुद को हीटेड टोबैको प्रोडक्ट्स के निर्माण केंद्र के रूप में स्थापित किया है। इन देशों ने तंबाकू का प्रोत्साहन नहीं दिया — बल्कि इसे बेहतर तरीके से नियंत्रित किया है।
भारत के पास भी यह करने की पूरी क्षमता है — संसाधन, प्रतिभा और संस्थागत ढांचा मौजूद है। लेकिन सुधार की दिशा में कदम ठोस और योजनाबद्ध होने चाहिए। इस क्षेत्र की अनदेखी करने से नुकसान कम नहीं होगा। आधुनिकीकरण कोई विकल्प नहीं, बल्कि एकमात्र जिम्मेदार और दूरदर्शी रास्ता है।