ओडिशा में कथित ज़मीन घोटाला: गरीब ग्रामीणों ने JSW, सैफरन और लैंको सौदे की SEBI जांच की मांग की; निवेशकों के साथ धोखाधड़ी और भारी सार्वजनिक नुकसान की दी चेतावनी
भुवनेश्वर, 21 जनवरी: जनहित से जुड़े एक गंभीर मामले में, जो निवेशक सुरक्षा, नियामक निगरानी और हाशिए पर खड़े किसानों के न्याय पर गंभीर सवाल उठाता है, ओडिशा के ढेंकानाल जिले के खड़गप्रसाद और खुरुंती गांवों के हजारों ग्रामीणों ने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) से संपर्क किया है। ग्रामीणों ने प्रतिष्ठित सूचीबद्ध कंपनी JSW स्टील लिमिटेड, दिवालिया हो चुके लैंको ग्रुप और सैफरन रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड (जिसकी पिछले कई वर्षों से कोई आय नहीं है) के बीच भूमि हस्तांतरण में कथित बड़े पैमाने की अनियमितताओं की तत्काल जांच की मांग की है।
ग्रामीणों ने आगाह किया है कि इस संदिग्ध सौदे से न केवल निवेशकों को धोखा दिया जा रहा है, बल्कि इससे सार्वजनिक धन की भी भारी हानि होने की संभावना है। यह शिकायत उन गरीब किसानों के हितों की रक्षा के लिए की गई है जिनकी ज़मीनें इन सौदों के केंद्र में हैं।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि इस मामले के दूरगामी परिणाम न केवल अपनी ज़मीन खो चुके किसानों के लिए, बल्कि निवेशकों के भरोसे और भारत के पूंजी बाजारकी विश्वसनीयता के लिए भी होंगे।
यह प्रतिवेदन ‘आंचलिक शिल्पांचल क्षतिग्रस्त प्रजासंघ’ के उपाध्यक्ष और मूल भूमि मालिक किसानों के निर्वाचित प्रतिनिधि, श्री नरेंद्र कुमार साहू द्वारा प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने कहा है कि हजारों गरीब ग्रामीणों की लगभग 900 से 1,000 एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि को व्यवस्थित तरीके से डायवर्ट किया गया है, उसका मूल्य काफी कम आंका गया है और इसे एक ऐसे ‘स्ट्रक्चर्ड ट्रांजेक्शन’ के माध्यम से स्थानांतरित किया गया है जो भूमि वापसी कानूनों की अनदेखी करता है। उनका आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया किसानों के अधिकारों को दरकिनार कर ग्रामीणों और सरकारी खजाने की कीमत पर अनुचित लाभ कमाने के लिए की गई है।
वर्ष 2008 और 2010 के बीच, ओडिशा औद्योगिक अवसंरचना विकास निगम (IDCO) ने हैदराबाद स्थित लैंको ग्रुप द्वारा प्रस्तावित 1,320 मेगावाट के सुपरक्रिटिकल कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट के लिए खड़गप्रसाद और खुरुंती गांवों के ग्रामीणों से लगभग 1,000 एकड़ कृषि भूमि का अधिग्रहण किया था। उस समय किसानों को स्थायी रोजगार, व्यावसायिक अवसरों और दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा के वादों के आधार पर ₹3 लाख से ₹6 लाख प्रति एकड़ के बीच मामूली मुआवजा दिया गया था। इन आश्वासनों पर भरोसा करते हुए, गरीब किसानों ने अपनी पैतृक भूमि सौंप दी थी, जो उनकी आजीविका का एकमात्र स्रोत थी।
परियोजना का निर्माण कार्य शुरू हुआ और कई ग्रामीणों ने इस उम्मीद में अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी निवेश कर दी कि वे परियोजना के लिए ठेकेदार, कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता और ट्रांसपोर्टर के रूप में काम करेंगे। हालांकि, आंशिक निर्माण के बावजूद यह प्रोजेक्ट कभी चालू नहीं हो सका। बाद में लैंको समूह दिवालिया हो गया और परिसमापन (Liquidation) के लिए हैदराबाद स्थित नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) का दरवाजा खटखटाया। प्रोजेक्ट को बीच में ही छोड़ दिया गया, ग्रामीण बेरोजगार हो गए और स्थानीय ठेकेदारों तथा आपूर्तिकर्ताओं पर सैकड़ों करोड़ों रुपये का बकाया कर्ज चढ़ गया। जिला अधिकारियों, लैंको के प्रतिनिधियों और आधिकारिक परिसमापक (Liquidator) की उपस्थिति में दिए गए आश्वासनों के बावजूद, ग्रामीणों को कभी कोई राहत नहीं मिली।
‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित मुआवजे और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम’ की धारा 101 के तहत, यदि कोई अधिग्रहित भूमि पांच वर्षों तक अप्रयुक्त रहती है, तो उसे मूल भू-स्वामियों या उनके कानूनी वारिसों को वापस किया जाना अनिवार्य है। एक दशक से अधिक समय तक भूमि का उपयोग न होने और ग्रामीणों द्वारा बार-बार किए गए आवेदनों के बावजूद, ज़मीन कभी वापस नहीं की गई। इसके विपरीत, वित्तीय वर्ष 2023-24 में NCLT ने इस भूमि को ‘सैफरन रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड’ को लगभग रू.10 लाख प्रति एकड़ की चौंकाने वाली कम कीमत पर हस्तांतरित करने की मंजूरी दे दी, जिससे कुल प्रतिफल लगभग रू 92 करोड़ रहा। यह तब हुआ जब इसी क्षेत्र में समान औद्योगिक भूमि का सौदा रू.80 लाख से रू.1 करोड़ प्रति एकड़ की दर से किया जा रहा था।
पूरी प्रक्रिया के दौरान प्रभावित ग्रामीणों, इडको (IDCO) या ओडिशा राज्य सरकार को विश्वास में नहीं लिया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि इस सौदे में कोई पारदर्शी बेंचमार्किंग या स्वतंत्र मूल्यांकन नहीं किया गया, जिससे ग्रामीणों को यह विश्वास हो गया है कि इस लेनदेन की रूपरेखा ज़मीन की कीमत को दबाने और उन्हें उनके कानूनी अधिकारों से वंचित करने के लिए तैयार की गई थी। इसके तुरंत बाद, JSW ग्रुप ने कथित तौर पर सैफरन रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड का अधिग्रहण या विलय कर लिया, जिससे उसे लगभग 900 एकड़ प्रमुख औद्योगिक भूमि पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण प्राप्त हो गया।
रिपोर्टों के अनुसार, सार्वजनिक खुलासों और फाइलिंग में इसी ज़मीन का मूल्य विलय के बाद लगभग ₹680 करोड़ बताया गया है, जो बहुत ही कम समय में मूल्यांकन के एक बहुत बड़े अंतर को उजागर करता है। ग्रामीणों का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया एक ‘फर्जी लेनदेन संरचना’ (sham transaction structure) का संकेत देती है, जिसे भूमि वापसी कानूनों की अनदेखी करने, संपत्ति के मूल्यों को गलत तरीके से पेश करने, निवेशकों को गुमराह करने और अनुचित लाभ प्राप्त करने के लिए बनाया गया है। यदि ये आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह कॉर्पोरेट प्रशासन और बाजार पारदर्शिता की मूल भावना पर कड़ा प्रहार है।
कथित तौर पर इस लेनदेन ने सरकारी खजाने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुँचाया है। माना जा रहा है कि ओडिशा राज्य सरकार को स्टाम्प शुल्क में लगभग रू.56 करोड़ का नुकसान हुआ है, जबकि केंद्र सरकार को लगभग रू. 200 करोड़ के पूंजीगत लाभ कर (Capital Gains Tax) का घाटा हुआ है। इसके अतिरिक्त, स्थानीय ठेकेदारों, श्रमिकों, आपूर्तिकर्ताओं और ट्रांसपोर्टरों का अनुमानित रू. 250 से रू.300 करोड़ बकाया है, जो लैंको परियोजना के विफल होने के बाद से अब तक भुगतान नहीं किया गया है।

आर्थिक और नियामक चिंताओं के अलावा, ग्रामीणों ने गंभीर पर्यावरणीय आशंकाएं भी व्यक्त की हैं। ढेंकानाल क्षेत्र पहले से ही गंभीर रूप से प्रदूषित है, जहाँ वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) अक्सर 400 के पार चला जाता है। ब्राह्मणी नदी प्रभावी रूप से औद्योगिक कचरे के डंपिंग ग्राउंड में बदल गई है, और इस क्षेत्र में हाथी गलियारे (elephant corridors) तथा पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र शामिल हैं। इसी भूमि पर किसी भी नई औद्योगिक गतिविधि से दो जिलों के सार्वजनिक स्वास्थ्य, जैव विविधता और पर्यावरणीय स्थिरता को अपूरणीय क्षति होगी।
अपनी अपील में, ग्रामीणों ने SEBI से आग्रह किया है कि वह सैफरन रिसोर्सेज के संबंध में JSW स्टील द्वारा BSE और NSE में प्रस्तुत किए गए खुलासों, फाइलिंग और मूल्यांकन विवरणों की जांच करे। वे यह पता लगाना चाहते हैं कि क्या यह लेनदेन गलत बयानी, नियामक अंतरपणन , धोखाधड़ी या निवेशक धोखे की श्रेणी में आता है। उन्होंने मांग की है कि SEBI इस मामले में NSE, आयकर विभाग, इडको (IDCO) और राज्य राजस्व अधिकारियों के साथ समन्वय करे ताकि वैधानिक और वित्तीय उल्लंघनों की पूरी सीमा का पता लगाया जा सके। ग्रामीणों ने लेनदेन की समीक्षा, निलंबन या उसे रद्द करने की भी मांग की है और यह मांग रखी है कि या तो ज़मीन मूल किसानों को वापस की जाए या बढ़े हुए मूल्य के साथ उचित बाजार मुआवजा दिया जाए।
श्री नरेंद्र कुमार साहू ने कहा, “जिसे औद्योगिक विकास के रूप में पेश किया गया था, उसका परिणाम पिछले पंद्रह वर्षों से बेदखली, संकट और कानूनी अधिकारों के हनन के रूप में निकला है। यह मामला केवल किसानों की ज़मीन का नहीं है। यह भारत के नियामक संस्थानों, निवेशक संरक्षण ढांचे और कानून के शासन की परीक्षा है। यदि ऐसे लेनदेनों की जांच नहीं की गई, तो इससे बाजारों और शासन दोनों में जनता का विश्वास गंभीर रूप से कम होगा।”
इस अपील की प्रतियां माननीय प्रधानमंत्री, केंद्रीय वित्त मंत्री, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री, NSE और BSE के नेतृत्व, भारत के मुख्य सतर्कता आयुक्त और ओडिशा के मुख्य सचिव को भेजी गई हैं। ढेंकानाल के किसानों का कहना है कि अब उन्हें संवैधानिक और नियामक अधिकारियों से अंतिम उम्मीद है कि वे निर्णायक हस्तक्षेप करेंगे और नागरिकों, निवेशकों तथा सरकारी खजाने को इस गहरे अन्यायपूर्ण और शोषणकारी लेनदेन से बचाएंगे।
