WHO ने वैश्विक स्तर पर बढ़ती इनफर्टिलिटी की समस्या पर जताई चिंता: भारत में क्यों जरूरी है ‘अर्ली फर्टिलिटी मैपिंग’
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने हाल ही में रेखांकित किया है कि दुनिया भर में लगभग छह में से एक व्यक्ति अपने प्रजनन वर्षों के दौरान बांझपन का अनुभव करता है। यह आंकड़ा उन रुझानों की पुष्टि करता है जिन्हें स्वास्थ्य विशेषज्ञ पिछले काफी समय से देख रहे हैं। आज बड़ी संख्या में जोड़े गर्भधारण से जुड़ी समस्याओं के लिए चिकित्सा सहायता ले रहे हैं- अक्सर अधिक उम्र में और उन स्वास्थ्य समस्याओं के साथ जो पिछले कई वर्षों में धीरे-धीरे विकसित हुई हैं।
बिरला फर्टिलिटी एंड आईवीएफ, अहमदाबाद की फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट, डॉ. निमिषा शांतिलाल पंड्या का कहना है कि आज इनफर्टिलिटी शायद ही किसी एक कारण से होता है। इसके बजाय, यह आमतौर पर देरी से हुए निदान बदलती जीवनशैली, मेटाबॉलिक समस्याओं और बढ़ती उम्र के प्राकृतिक प्रभावों का एक जटिल मिश्रण होता है।
भारत में, विभिन्न जनसंख्या समूहों के आधार पर बांझपन की दर 3.8 प्रतिशत से 17 प्रतिशत के बीच है। हालांकि, मुख्य चिंता केवल प्रभावित लोगों की संख्या नहीं है, बल्कि वह समय है जब लोग इस समस्या को पहचानते हैं। कई लोग यह मान लेते हैं कि उनका प्रजनन स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक है, जब तक कि उन्हें गर्भधारण में कठिनाई नहीं होती। जब तक वे विशेषज्ञ की सलाह लेते हैं, तब तक ओवेरियन रिजर्व कम हो सकती है, शुक्राणु की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है, या मेटाबॉलिक और हार्मोनल असंतुलन बढ़ चुका होता है। ये परिवर्तन अक्सर ‘साइलेंट’ होते हैं और बिना जांच के इनका पता नहीं चलता।
यही कारण है कि अर्ली फर्टिलिटी मैपिंग (Early Fertility Mapping) का महत्व बढ़ जाता है। गर्भधारण की कोशिश करने से पहले प्रजनन हार्मोन, ओवेरियन रिजर्व, गर्भाशय के स्वास्थ्य और शुक्राणु के प्रमुख मापदंडों की सक्रिय रूप से जांच करके, डॉक्टर संभावित जोखिमों को शुरुआत में ही पहचान सकते हैं। यह दृष्टिकोण समय पर उपचार और स्पष्ट चर्चा का अवसर देता है, जब समाधान अभी भी सरल होते हैं। जीवनशैली, वजन प्रबंधन या मेटाबॉलिक स्वास्थ्य में किए गए छोटे बदलाव भी परिणामों पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं, बशर्ते उन्हें समय रहते पहचान लिया जाए।
जांच में देरी करना स्थिति को जटिल बना सकता है। जब कई समस्याएं एक साथ जमा हो जाती हैं, तो जोड़ों को अधिक विस्तृत परीक्षणों, उन्नत उपचारों या ‘असिस्टेड रिप्रोडक्टिव तकनीक’ (ART) की आवश्यकता पड़ सकती है। ये हस्तक्षेप न केवल चिकित्सकीय रूप से चुनौतीपूर्ण हैं, बल्कि वित्तीय और भावनात्मक तनाव को भी बढ़ाते हैं। कई जोड़ों का मानना है कि यदि उन्हें पहले जानकारी होती, तो वे काफी तनाव, समय और खर्च बचा सकते थे।
बांझपन के कारणों को लेकर अनिश्चितता अक्सर चिंता, अपराधबोध और जल्दबाजी में लिए गए फैसलों का कारण बनती है। अपने प्रजनन स्वास्थ्य की शुरुआती समझ स्पष्टता लाती है, जिससे इलाज की योजनाएं अधिक वास्तविक बन पाती हैं और उस भावनात्मक उथल-पुथल को कम किया जा सकता है जो फर्टिलिटी चुनौतियों के साथ आती है।
आज जब लोग शिक्षा, करियर या शहरी जीवनशैली के कारण माता-पिता बनने के निर्णय को टाल रहे हैं, तो फर्टिलिटी के प्रति जागरूकता भी उसी के अनुरूप बदलनी चाहिए। ‘अर्ली फर्टिलिटी मैपिंग’ प्रजनन स्वास्थ्य को नियमित जीवन योजना (life planning) का हिस्सा बनाती है। यह न केवल भविष्य की चिकित्सा और वित्तीय परेशानियों को कम करती है, बल्कि परिवारों को सुरक्षित और सुनियोजित तरीके से माता-पिता बनने का मार्ग भी प्रशस्त करती है।
