रहस्यमयी सिद्ध शक्ति तंत्र की खोज
लेखक : साध्वी जी ” ह्रीं ” चिंतना श्री जी। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में सिद्ध शक्ति तंत्र एक ऐसी गूढ़ विद्या है, जिसे आत्मा और ब्रह्मांड के बीच सेतु माना गया है। कुलार्णव तंत्र में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि तंत्र केवल क्रिया नहीं, बल्कि चेतना का विज्ञान है—जो गुरु, साधना और अनुशासन से प्रकट होता है। प्राचीन सिद्ध योगियों ने इस विद्या को लोककल्याण, आत्मबोध और आंतरिक शक्ति जागरण का माध्यम बनाया। इसी कारण तंत्र आज भी रहस्य बना हुआ है और केवल योग्य साधकों तक ही सीमित रहा है।
शास्त्रों में वर्णित कुंडलिनी शक्ति सिद्ध शक्ति तंत्र का मूल आधार मानी जाती है। शट्चक्र निरूपण और योग-तंत्र ग्रंथों के अनुसार यह शक्ति मूलाधार चक्र में सुप्त अवस्था में स्थित रहती है, जिसे विशेष तांत्रिक साधना द्वारा जागृत किया जाता है। जब यह शक्ति सहस्रार तक आरोहण करती है, तब साधक को मानसिक स्थिरता, तेजस्विता और आत्मसाक्षात्कार की अनुभूति होती है। यह सिद्धांत तंत्र को केवल रहस्यमय नहीं, बल्कि गहन चेतना-विज्ञान सिद्ध करता है।
सिद्ध शक्ति तंत्र का प्रयोग केवल आध्यात्मिक उन्नति तक सीमित नहीं रहा है। रुद्रयामल तंत्र और भैरव तंत्र में मंत्र, न्यास और प्राण-साधना द्वारा रोग निवारण के शास्त्रीय उदाहरण मिलते हैं। शास्त्र मानते हैं कि रोग शरीर से पहले प्राण में उत्पन्न होता है और जब प्राण संतुलित होता है, तब शरीर स्वतः स्वस्थ होने लगता है। आधुनिक योग और आयुर्वेद भी इसी सिद्धांत को वैज्ञानिक भाषा में स्वीकार करते दिखाई देते हैं।

महानिर्वाण तंत्र में कहा गया है कि सिद्ध शक्ति का उद्देश्य व्यक्तिगत चमत्कार नहीं, बल्कि लोक-संग्रह और धर्म-संरक्षण है। प्राचीन काल में सिद्ध तांत्रिक प्राकृतिक आपदाओं, महामारी और सामाजिक असंतुलन के समय विशेष अनुष्ठान करते थे। आज आवश्यकता है कि तंत्र को भय, अंधविश्वास या सनसनी के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि शास्त्रीय, नैतिक और विवेकपूर्ण दृष्टि से समझा जाए। तभी रहस्यमयी सिद्ध शक्ति तंत्र की खोज मानवता के लिए एक सकारात्मक और प्रकाशमय मार्ग बन सकती है।
